74 दिन - 'मौत से जंग, जिंदगी से वादा'...आपने भी जिंदगी में कभी खुद को हारते हुए देखा है तो इस किताब को पढ़िए जरूर

74 दिन - 'मौत से जंग, जिंदगी से वादा'...आपने भी जिंदगी में कभी खुद को हारते हुए देखा है तो इस किताब को पढ़िए जरूर

74 दिन

''मौत से जंग, जिंदगी से वादा''

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74 दिनों तक जीवन और मृत्यु के बीच झूलती एक सांस...

यह कहानी नहीं... ‘सच्चाई’ है उस संघर्ष की जो 74 दिनों तक मौत से आंख लड़ाकर न केवल की गई, बल्कि जिद और जीने की इच्छा से जीती भी गई। यह कहानी मेरे संघर्ष के उन दिनों की है जो शायद हर किसी की समझ में न आए। क्योंकि इन दिनों में मुझ पर और मेरे परिवार पर क्या गुजरी है, उसे मैं लिख तो सकता हूं, लेकिन उसे महसूस हर कोई नहीं कर पाएगा। 

यह उन 74 दिनों की कहानी है जब मैं कोविड-19 की दूसरी लहर में मौत के सबसे करीब पहुंच गया था। जहां मशीनें धड़कन गिन रही थीं, वहां मेरा मन सिर्फ एक चीज दोहरा रहा था कि मुझे हारना नहीं है। 74 दिनों तक मौत से जंग करने के बाद भी करीब एक साल ऑक्सीजन सपोर्ट पर बिस्तर पर पड़े रहना भी किसकी नर्क से कम नहीं था, लेकिन यहां भी हारने के बजाय मैंने अपना यह कठिन समय कागज और कलम के साथ बिताया। हर उस संघर्ष को लिखा जो मैं झेल चुका था और झेल रहा था। लिखता गया, लिखता गया....और कब न जाने कब इसने एक किताब का रूप ले लिया। बस, इसी तरह ये किताब तैयार हो गई। 

यह किताब सिर्फ एक संघर्ष की गाथा नहीं है, यह उदाहरण है-विश्वास, परिवार और आत्मबल का। जीत और हार, वैसे तो एक ही सिक्के के दो पहलू हैं लेकिन इस धरती

पर ऐसा शायद ही कोई होगा जिसने कभी हार का सामना नहीं किया होगा। अगर आपने भी कभी जीवन में किसी प्रकार की हार देखी है, तो यह किताब आपको फिर से उठ खड़े होने की प्रेरणा दे सकती है। 

केवल एक ही नहीं, 2021 से 2025 तक के इन पांच सालों में तीन बार ऐसा वक्त मेरे जीवन में आया, जब जान के लाले पड़ गए। पर, तीनों बार मौत को शिकस्त देते हुए मैं फिर जिंदगी की रेस में शामिल हो गया। 

मैंने इस किताब को सिर्फ अपने दर्द को बांटने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए लिखा है ताकि आप समझ सकें कि जब दुनिया साथ छोड़ देती है, तब ईश्वर कैसे साथ निभाता है।

जब शरीर जवाब दे देता है, तब आत्मा कैसे खड़ी रहती है और जब सबकुछ खत्म-सा लगने लगता है, तब परिवार और प्रेम कैसे नई शुरुआत का संबल बनते हैं। यह किताब एक प्रयास है, अपनी उस यात्रा को शब्द देने का, जिसे मैं और मेरे परिवार वाले आज भी सोचते हैं तो सबकी रूह कांप जाती है। ऐसे में अगर यह किताब किसी एक को भी उम्मीद दे सके, तो समझूंगा मेरा यह संघर्ष सफल हुआ। 

मैं नहीं जानता कि आप इस किताब को किस रूप में पढ़ेंगे- कहानी, आत्मकथा या जीवन अनुभव, पर मैं यही चाहता हूं कि आप इसे एक बार पढ़कर जरूर देखें और जब आप इसे पढ़ें, तो इसे दिल से पढ़ें, क्योंकि यह सिर्फ मेरा नहीं, हर उस इंसान का अनुभव है जिसने कभी जीवन के लिए लड़ाई लड़ी है। यदि आप भी इस किताब को पढ़ना चाहते हैं तो नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके ऑर्डर कर सकते हैं।

https://www.adhyayanbooks.com/book/74-%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8-%E0%A4%AE%E0%A5%8C%E0%A4%A4-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%9C%E0%A4%82%E0%A4%97-%E0%A4%9C%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%97%E0%A5%80-%E0%A4%B8%E0%A5%87-%E0%A4%B5%E0%A4%BE/

आपका-

सौरभ


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  • user by Anonymous

    ये अनमोल डॉक्टर डोनेशन वाला है। ये और इसका बाप दोनों haraami है

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    भाजपा जनता को पागल समझ रही है। अगले चुनाव में मिलेगा इसका खामियाजा

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