राशन में 'रिश्वत': पूर्व कोटेदार बोला...'सप्लाई इंस्पेक्टर को देने पड़ते हैं रुपये, तभी पांच किलो कम देते हैं राशन'
ग्रामीण से फोन पर बातचीत में पूर्व कोटेदार ने स्वीकारा, पूर्ति विभाग के इंस्पेक्टर को जाता है हिस्सा
हर कार्ड पर पांच-छह किलो कम राशन देने की बात सामने आई, पूर्ति विभाग की भूमिका पर भी उठे सवाल
बदायूं। सरकार द्वारा लोगों को दिए जा रहे राशन में भ्रष्टाचार का घुन लगा है। इसके तमाम मामले गाहे-बगाहे सामने आते रहे हैं। ताजा मामला ब्लॉक अंबियापुर के गांव सतेती का है, जहां एक पूर्व कोटेदार फोन पर एक ग्रामीण से हुई बातचीत में यह स्वीकार कर रहा है, कि उपभोक्ताओं को पांच-छह किलो राशन हर बार कम दिया जाता है क्योंकि पूर्ति विभाग के इंस्पेक्टर को रुपये देने होते हैं। ऑडियो सामने आने पर ग्राम सतेती निवासी अजीत सिंह ने डीएम को लिखित शिकायत देकर पूरे प्रकरण की जांच की मांग की है।

शिकायतकर्ता ने कहा है कि प्रकरण से जुड़े ऑडियो साक्ष्यों में निवर्तमान राशन डीलर उमेश शर्मा एवं उनके पुत्र नवनीत शर्मा को यह स्वीकार करते हुए सुना जा सकता है कि प्रत्येक राशन कार्ड पर औसतन पांच से छह किलो तक कम राशन दिया जाता रहा है। इस बातचीत में सप्लाई इंस्पेक्टर को नियमित रूप से रिश्वत दिए जाने की बात भी निवर्तमान कोटेदार द्वारा कही जा रही है, जिससे विभागीय मिलीभगत की आशंका और गहरी हो गई है।


शिकायत में कहा गया है कि है कि प्रधान और कोटेदार के प्रभाव के कारण लंबे समय तक भय और दबाव के चलते कोई भी खुलकर शिकायत नहीं कर सका। उल्लेखनीय है कि पूर्व कोटेदार की पत्नी वर्तमान में ग्राम प्रधान हैं, जिससे स्थानीय स्तर पर प्रभाव और दबदबे का वातावरण बना रहा है। इसी कारण यह कथित भ्रष्टाचार वर्षों तक दबा रहा। इस संबंध में जब निवर्तमान कोटेदार से उनका पक्ष लेने को फोन किया गया तो उनका फोन नॉट रीचेबल बताता रहा।
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सरकारी राशन के गबन का मामला
बदायूं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के अंतर्गत वितरित किया जाने वाला राशन पूरी तरह सरकारी संपत्ति होता है। निर्धारित मात्रा से कम राशन देना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि सरकारी राशन के गबन और आपराधिक विश्वासघात की श्रेणी में आता है। हालांकि 'सबकी बात न्यूज' ऑडियो की पुष्टि नहीं करता है लेकिन यदि ऑडियो में की गई स्वीकारोक्ति की पुष्टि होती है, तो यह सरकारी राशन के गबन के आधार पर गंभीर आपराधिक मामला बनता है।
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केवल लाइसेंस निरस्तीकरण पर उठे सवाल
बदायूं। शिकायतकर्ता का कहना है कि हालांकि बाद में संबंधित कोटेदार का लाइसेंस निरस्त कर दिया गया, लेकिन इस कार्रवाई को कई लोग अपर्याप्त मान रहे हैं। न तो अब तक कोई एफआईआर दर्ज हुई है, न ही कथित गबन किए गए राशन की रिकवरी की गई है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि क्या केवल लाइसेंस रद्द कर देने से इतने बड़े भ्रष्टाचार पर पर्दा डाल दिया गया?
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फर्जी शपथपत्र का आरोप भी चर्चा में
बदायूं। प्रकरण में एक और गंभीर आरोप यह है कि कोटेदार द्वारा प्रशासन को गुमराह करने के उद्देश्य से एक शपथपत्र प्रस्तुत किया गया, जिसमें ग्राम प्रधान से संबंध विच्छेद होने की बात कही गई। बताया जा रहा है कि इस दावे के समर्थन में कोई वैधानिक या न्यायालयीय दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे शपथपत्र की सत्यता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
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प्रशासन से उच्चस्तरीय जांच की मांग
बदायूं। शिकायतकर्ता द्वारा जिलाधिकारी सहित उच्च अधिकारियों को प्रकरण से अवगत कराते हुए निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग की गई है। मांग की जा रही है कि दोष सिद्ध होने पर संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध आपराधिक कार्रवाई, विभागीय दंड और सरकारी क्षति की रिकवरी सुनिश्चित की जाए।
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जनहित और सिस्टम पर सवाल
बदायूं। यह मामला केवल एक गांव या एक कोटेदार तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि यह पूरे सार्वजनिक वितरण तंत्र की निगरानी और पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। यदि समय रहते प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई, तो इससे आम जनता का शासन और प्रशासन पर भरोसा और कमजोर हो सकता है।
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