विरोध की ये चिंगारी...विधानसभा चुनाव में 'आग' बनी तो समाजवादी पार्टी की बढ़ सकती हैं मुश्किलें
सपा की कार्यकारिणी घोषित होते ही उठने लगे विरोध के स्वर, समर्पित कार्यकर्ता बोले- विरोध नहीं कर रहे, अधिकार मांग रहे
विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष की सूची जारी होते ही मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व को उठे सवाल, मुस्लिम नेताओं ने सोशल मीडिया पर उठाई आवाज
पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव के लोगों को भी किया नजरअंदाज, 2009 और 2014 की जीत में थी इनकी अहम भूमिका
सबकी बात न्यूज
बदायूं। समाजवादी पार्टी की जिला, नगर और विधानसभा क्षेत्रों की कार्यकारिणी की घोषणा होते ही पार्टी के अंदर विरोध के स्वर भी उठने लगे हैं। कोई इसे जिलाध्यक्ष की मनमानी बता रहा है तो कोई पार्टी को अंदर ही अंदर तोड़ने की साजिश, लेकिन इतना जरूर है कि यदि इस विरोध की चिंगारी अगले विधानसभा चुनाव तक जा पहुंची तो भड़की आग सपा को नुकसान भी पहुंचा सकती है।
हाल ही में विरोध के स्वर तब उठे, जब छह विधानसभा क्षेत्रों के अध्यक्षों की घोषणा की गई और इनमें एक भी मुस्लिम नहीं था। ऐसे में पार्टी वर्षों पुराने मुस्लिम कार्यकर्ताओं ने यह कहते हुए विरोध दर्ज कराना शुरू कर दिया कि जिले में करीब पांच लाख मुसलमान और करीब साढ़े तीन लाख यादव हैं। इस पर भी किसी मुस्लिम को विधानसभा क्षेत्र का अध्यक्ष न बनाया जाना सपा के पीडीए फॉर्मूले को ध्वस्त करता दिखाई दे रहा है। पार्टी से जुड़े कुछ सूत्रों ने तो जिला, नगर और विभिन्न प्रकोष्ठों के पदाधिकारियों पर भी सवाल उठाए हैं। इनका कहना है कि नई कार्यकारिणी में उन लोगों को ज्यादा तबज्जो दी गई है, जो बड़े पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों की जी हुजूरी में ज्यादा वक्त देते हैं। कुछ का तो यहां तक कहना है कि पदाधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का झोला उठाने वालों को पदाधिकारी बना दिया गया है। ऐसे लोगों की खुद की न कोई व्यक्तिगत पहचान है और न ही कोई राजनीतिक कद। ये लोग ऐसे हैं, जिन्हें पार्टी की निष्ठा से कोई मतलब नहीं है।
सबसे खास बात ये है कि नई कार्यकारिणी में उन लोगों को नजरअंदाज कर दिया गया है जिन्होंने पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव की दोनों बार की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी और इन्हीं कार्यकर्ताओं के बल पर धर्मेंद्र यादव तब सांसद बने जब 2009 में प्रदेश में बसपा की सरकार थी और 2014 में पूरे देश में मोदी लहर चल रही थी। ऐसे में धर्मेंद्र के वफादार सिपाही भी खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं।
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...तो क्या दिल 'बड़ा' नहीं कर पाए जिलाध्यक्ष
बदायूं। समाजवादी पार्टी की नई कार्यकारिणी पर जहां सवाल उठ रहे हैं वहीं दो ढाई दशकों से पार्टी से जुड़े नेता भी इसे पचा नहीं पा रहे हैं। विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम समाज के प्रतिनिधित्व के बारे में अल्पसंख्यक सभा के पूर्व जिलाध्यक्ष मोहम्मद मियां का कहना है कि वह 30 सालों से भी ज्यादा समय से पार्टी से जुड़े हैं। सोशल मीडिया पर नाराजगी जता चुके मोहम्मद मियां का कहना है कि यदि पार्टी में रहकर भी अपने समाज की बात नहीं उठाएंगे तो क्या फायदा। बोले जून में जब राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने खास लोगों के साथ बैठक की थी तो जिलाध्यक्ष आशीष यादव से कहा था कि दिल बड़ा करिये, सारे समाज को प्रतिनिधित्व दीजिए, पर विधानसभा क्षेत्र अध्यक्ष की सूची में एक भी मुस्लिम को जगह नहीं दी गई।
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पूर्व जिला सचिव को बना दिया सदस्य, कार्यकारिणी घोषित होते ही इस्तीफा
बदायूं। आमगांव निवासी राहुल कुर्मी पार्टी के पुराने साल 2009 से पार्टी के सदस्य हैं और पार्टी के जिला सचिव जैसे महत्वपूर्ण पद पर काबिज रहे हैं। नई कार्यकारिणी में उन्हें कार्यकारिणी सदस्य बना दिया गया। जैसे ही इसकी सूचना उन्हें मिली, उन्होंने तुरंत पार्टी से इस्तीफा दे दिया। राहुल कहते हैं कि सीधा-सीधा उनका डिमोशन कर
दिया गया। वह पार्टी के पुराने कार्यकर्ता हैं और आगे भी पार्टी के लिए काम करते रहेंगे लेकिन जो इस समय किया जा रहा है, वह सही नहीं हो रहा। उन्होंने सीधे-सीधे पार्टी के एक वरिष्ठ नेता, एक जनप्रतिनिधि तथा उनके पीए पर आरोप लगाया कि उनकी मनमानी चल रही है।
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पार्टी के वफादार हैं, अपना हक मांग रहे हैं
बदायूं। अल्पसंख्यक सभा के प्रदेश सचिव मोतशाम सिद्दीकी कहते हैं कि जब 15 जून को राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव के साथ लखनऊ में बैठक हुई तो कहा गया था कि संगठन में हमारी संख्या को देखते हुए भागीदारी भी होनी चाहिए। इस पर आश्वासन भी मिला था लेकिन जब नई कार्यकारिणी घोषित की गई तो ऐसा नहीं हुआ। इस पर पार्टी को संज्ञान लेना चाहिए था। उन्होंने साफ कहा कि जिलाध्यक्ष मनमानी कर रहे हैं और इसी वजह से कार्यकारिणी घोषित होते ही एक इस्तीफा भी हो गया।
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जब कोई तैयार नहीं था तब बनाया नगर अध्यक्ष, अब हटा दिया
बदायूं। बिल्सी निवासी कवींद्र सक्सेना साल 2022 के अंत में नगर अध्यक्ष बनाए गए थे लेकिन नई कार्यकारिणी में उन्हें जगह नहीं दी गई। उनके स्थान पर दीपक शर्मा को नगर अध्यक्ष बना दिया गया। इसकी कसक कवींद्र सक्सेना के दिल में है। वह कहते हैं कि वह उस समय पार्टी के नगर अध्यक्ष बने थे जब कोई सपा में पद लेने को तैयार नहीं था, लेकिन अब जब समय आया तो उनसे जिम्मेदारी छीनकर दूसरे को दे दी गई। उन्होंने यह भी कहा कि नये नगर अध्यक्ष तो भाजपा के बूथ स्तर के पदाधिकारी रहे हैं और उनके परिवार में भी भाजपाई हैं, लेकिन सपा ने उन्हें नगर अध्यक्ष की जिम्मेदारी दे दी।
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