बदायूं। भाजपा और सपा ने अपने प्रत्याशी घोषित कर दिए लेकिन बसपा ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले है। पहले माना जा रहा था कि भाजपा और सपा के प्रत्याशी घोषित होने के बाद बसपा भी अपना प्रत्याशी तय कर देगी, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो पाया है। ऐसे में जनता के मन में सवाल है कि क्या बसपा को प्रत्याशी नहीं मिल रहा या फिर बसपा कोई और रणनीति बनाकर सपा अथवा भाजपा में से किसी एक को फायदा या नुकसान पहुंचाने की मंशा पाले बैठी है। एक सवाल यह भी है कि क्या पूर्व मंत्री आबिद रजा चुनाव लड़ेंगे या नहीं। जीत-हार तो भविष्य की बात है लेकिन यह तय है कि उनके चुनाव लड़ने पर सपा और भाजपा में से किसी एक का नुकसान तो होगा।
----------
बदायूं में कभी जीत का 'सेहरा' नहीं बंधवा पाया ‘हाथी‘
बदायूं। वर्ष 2007 में विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल करके प्रदेश में सत्तारूढ़ होने वाली बहुजन समाज पार्टी बदायूं में लोकसभा चुनाव में कभी जीत हासिल नहीं कर पाई। हर बार बसपा प्रत्याशी कभी दूसरे तो कभी तीसरे नंबर पर रहा। हालांकि पार्टी ने हमेशा जातिगत आंकड़ों के आधार पर प्रत्याशी को उतारा, मगर मतदाताओं ने उसे गले नहीं लगाया। हालांकि यह भी वास्तविकता है कि बसपा प्रत्याशी ने जीत और हार को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
----------
ये रहा बसपा का इतिहास-
बदायूं। बसपा सुप्रीमो मायावती जिले की सुरक्षित सीट रही बिल्सी से 1996 में विधानसभा चुनाव जीत चुकी हैं, हालांकि उन्होंने बाद में यह सीट छोड़ दी थी। परंपरागत वोट के सहारे बसपा ने विधानसभा चुनाव में तो कई बार बेहतर प्रदर्शन किया, लेकिन वह वोट लोकसभा चुनाव में बसपा को कभी नहीं मिल सका। वर्ष 1996 में बसपा बदायूं संसदीय चुनाव में दूसरे नंबर पर रही थी। इस चुनाव में सपा के सलीम शेरवानी को 198065 तथा बसपा के ब्रजपाल सिंह शाक्य को 152878 वोट मिले थे। इसके बाद 1998 के चुनाव में बसपा तीसरे नंबर पर खिसक गई। इसमें सपा के सलीम शेरवानी 264583 वोट पाकर पहले, भाजपा की शांतिदेवी 224925 वोट पाकर दूसरे तथा बसपा के ब्रजपाल 104718 वोट पाकर तीसरे स्थान पर रहे थे। 1999 में उपचुनाव हुआ तो भी यही स्थिति रही। सपा के सलीम शेरवानी पहले, भाजपा की शांतिदेवी दूसरे तथा बसपा के ब्रजपाल तीसरे नंबर पर रहे। 2004 में प्रेमपाल सिंह बसपा के टिकट पर चुनाव लड़े लेकिन वह भी तीसरा नंबर ही ला सके। 2009 में बसपा की स्थिति में थोड़ा सुधार हुआ। तब पार्टी ने बदायूं से डीपी यादव को मैदान में उतारा था। उनमें और सपा के धर्मेंद्र यादव में कांटे की टक्कर हुई लेकिन डीपी केवल 32543 वोटों से धर्मेंद्र से हार गए। 2014 के चुनाव में बसपा के अकमल खां तीसरे नबंर पर रहे। हालांकि उन्हें 156973 वोट मिले थे। 2019 के चुनाव में सपा और बसपा का गठबंधन होने के कारण यह सीट सपा के खाते में चली गई थी।
----------
चौपाल लगाकर प्रतिद्वंद्वियों के दिलों की धड़कन बढ़ा रहे आबिद
बदायूं। सपा से इस्तीफा देने के बाद आबिद रजा लगातार लोगों के बीच जाकर चौपाल लगा रहे हैं। लोगों का कयास है कि इससे वह यह संदेश देना चाहते हैं कि वे भी चुनावी रण में ताल ठोक सकते हैं। हालांकि अभी यह तय नहीं है लेकिन इससे दोनों पार्टियों के प्रत्याशियों की धड़कन बढ़ी हैं। पिछले दिनों शिवपाल सिंह यादव भी आबिद के आवास पर जाकर मिल चुके हैं लेकिन उससे यह निष्कर्ष नहीं निकल पाया है कि आबिद सपा के विरोध में चुनाव लड़ेंगे या सपा का साथ देंगे। फिलहाल चुनावी मैदान में दो ही प्रत्याशी होने के कारण मुकाबला आमने सामने का है लेकिन आबिद के चुनाव लड़ने की घोषणा करते ही यह त्रिकोणीय हो जाएगा, इसमें कोई शक नहीं है। लोगों का कहना है कि यदि वह बसपा से चुनाव लड़ते हैं तो खुद समेत इन दोनों प्रत्याशियों की जीत हार में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
--------
17 वें दिन भी जारी रही चौपाल
बदायूं। पूर्व मंत्री आबिद रजा ने शुक्रवार को 17 वे दिन भी ‘‘जनता की चौपाल‘‘ लगाई। आबिद रजा ने मौहल्ला ऊपरपारा, नई बस्ती, चैधरी सराय, शकील रोड आदि में जनता से सीधा संवाद कायम कर जनता की समस्याओं को सुना और मौके पर समस्याओं का निस्तारण किया। मोहल्ले वासियों ने आबिद रजा का फूल माला डालकर जोरदार स्वागत किया। इस मौके पर सभासद, मुख्तियार अहमद, आदिल अंसारी, शारिक खान, नीशू खान, अदनान, मजहर अंसारी, कल्लू, कुलदीप चैहान, चिम्मन साहू, संजू पंडित, बबलू अंसारी, शाजिया अंसारी, डिम्पल, मुनव्वर,फहीम, शकील आदि मौजूद रहे
SAB KI BAAT
