बदायूं में हर दूसरे दिन कोई न कोई लगा लेता है फांसी...मरने वालों का आंकड़ा जानकर चौंक जाएंगे

बदायूं में हर दूसरे दिन कोई न कोई लगा लेता है फांसी...मरने वालों का आंकड़ा जानकर चौंक जाएंगे

औसतन 12-15 लोग हर महीने दे देते हैं जान, जून से नवंबर तक 72 लोगों ने फंदा लगाकर कर ली खुदकशी

पिछले छह महीनों में महिलाओं से ज्यादा पुरुषों ने की आत्महत्या, मरने वालों में 25 प्रतिशत महिलाएं तो 75 प्रतिशत पुरुष

सबकी बात न्यूज

बदायूं। बदायूं जिले में फांसी लगाकर मरने वालों का आंकड़ा चौंकाने वाला है। यहां औसतन 12 से 15 लोग हर महीने फांसी लगाकर जान दे देते हैं। यानी हर दूसरे दिन कोई न कोइ फांसी लगाकर यहां मर जाता है। इनमें भी पुरुषों की संख्या महिलाओं से कहीं ज्यादा है। जून से नवंबर-25 के पिछले छह महीने के आंकड़ों पर गौर करें तो


फांसी लगाकर मरने वाले 72 लोगों में केवल 25 प्रतिशत ही महिलाएं हैं, जबकि 75 प्रतिशत पुरुषों ने फंदा लगाकर आत्महत्या की है। ये आंकड़े भी केवल वो हैं जो मीडिया की नजरों में आए हैं। असल संख्या तो इससे भी कहीं ज्यादा हो सकती है। 


जून से नवंबर-25 तक के आंकड़ों पर गौर करें तो जून में 13 लोगों ने फांसी लगाकर अपनी जान दे दी। इसमें 11 पुरुष और दो महिलाएं थीं। जुलाई में पांच लोगों ने जान दी, जिसमें तीन पुरुष और दो महिलाएं शामिल थीं। अगस्त में यह आंकड़ा 11 और दो का रहा। यानी अगस्त में 11 पुरुषों ने फांसी लगाई और एक महिला व एक युवती ने जान दी। सितंबर में जान देने वालों में सात पुरुष और चार महिलाएं रहीं तो अक्तूबर

में 14 लोगों ने फांसी लगाकर अपनी ईहलीला समाप्त कर ली। इसमें आठ पुरुष और छह महिलाएं थीं। नवंबर-25 में दस लोगों ने खुदकुशी की। इसमें आठ पुरुष और दो महिलाएं शामिल थीं। इनमें कुछ दिन तो ऐसे भी रहे, जिनमें एक ही दिन में दो-तीन ऐसी घटनाएं सामने आईं। ये घटनाएं भी वह हैं जो मीडिया की जानकारी में आईं, नहीं तो कुछ ऐसे भी मामले हुए, जो पुलिस और मीडिया की नजर में भी नहीं आ पाए। 

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घटना का कारण सबसे ज्यादा पारिवारिक विवाद

बदायूं। फांसी लगाकर जान देने की इन घटनाओं के पीछे जो सबसे बड़ा कारण सामने आया, वह घरेलू विवाद का रहा। कहीं दंपती के बीच आपसी विवाद तो कहीं परिवार के किसी सदस्य से विवाद इन घटनाओं की वजह रहे। कुछ जगहों पर जमीन विवाद, प्रेम संबंध समेत विवाहेत्तर प्रेम संबंध भी इन घटनाओं का कारण बने। जून में कुंवरगांव के बनेई निवासी 47 वर्षीय चंद्रकेश ने तो फांसी लगाने से पहले अपनी वीडियो भी रिकॉर्ड की, जिसमें उसने पत्नी द्वारा उसका उत्पीड़न करने का आरोप लगाया। अगस्त में हजरतपुर थाना क्षेत्र के गांव वमनपुरा में 21 साल के अर्जुन और उसकी कथित प्रेमिका के शव गांव के बाहर फांसी पर लटके मिले थे। मामला प्रेम प्रसंग से जुड़ा बताया गया था।

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कई जगहों पर हत्या और आत्महत्या के बीच भी उलझा मामला

बदायूं। इन मामलों में कुछ ऐसे भी मामले रहे, जो हत्या और आत्महत्या के बीच झूलते रहे। यानी घटना के बाद परिवार के लोगों ने दूसरे पक्ष पर हत्या का आरोप लगाया। ऐसा महिलाओं की आत्महत्या के मामले में ज्यादा हुआ जब मायके वालों ने ससुराल वालों पर दहेज हत्या का आरोप लगाते हुए पुलिस को तहरीर दी। 

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सोशल मीडिया भी बन रही विवादों का कारण

बदायूं। जानकारों की मानें तो सोशल मीडिया भी रिश्तों में कड़वाहट घोल रही है और इसके शिकार दंपती हो रहे हैं। अगस्त में शहर के मोहल्ला काजी टोला निवासी सुनील ने फांसी लगाकर जान दे दी थी। इस घटना के पीछे जो कारण सामने आया था वह सोशल मीडिया से जुड़ा था। बताते हैं कि सुनील की पत्नी रील बनाती थी, जिसमें एक लड़का भी उसके साथ दिखता था। कुछ समय बाद पत्नी बिना बताए घर से चली गई तो सुनील ने जान दे दी। 

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जान देने वालों में आखिर पुरुष ज्यादा क्यों, जानिये साइकोलॉजिस्ट से

बदायूं। जिले में पिछले छह महीनों में फांसी लगाकर जान देने वालों में पुरुषों की संख्या ज्यादा रही है। फांसी लगाकर मरने वालों की कुल संख्या के आंकड़ों में यह 75 प्रतिशत बैठता है। इस बारे में जिला अस्पताल की क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट सर्वेश कुमारी का कहना है कि पुरुषों के ज्यादा मामले संभवतः उनकी प्रकृति के कारण

                         -क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट सर्वेश कुमारी-

होते हैं। पुरुषों पर जिम्मेदारियों का बोझा ज्यादा होता है। परिवार के हर सदस्य को उनसे उम्मीद होती है। जब वे इन उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाते तो वे अवसाद का शिकार हो जाते हैं। इसके अलावा पुरुष अपनी बात या समस्या हर किसी से शेयर नहीं कर पाते जबकि महिलाएं अपनी बात दूसरी महिलाओं को बताकर अपना दिल हलका कर लेती हैं। पुरुष अवसाद में जाने के बाद जल्दी ही हताशा का शिकार हो जाते हैं, जिसका परिणाम उनके द्वारा जान देने के रूप में सामने आता है। 

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सीजनल इफेक्टिव डिसऑर्डर (SAD ) भी एक कारण 

बदायूं। साइकोलॉजिस्ट की नजर में आत्महत्या का एक कारण सीजनल इफेक्टिव डिसऑर्डर (SAD) भी है। सैड एक तरह का डिप्रेशन (अवसाद) है जो मौसम बदलने, खासकर पतझड़ और सर्दियों में, कम धूप मिलने के कारण होता है। इसमें व्यक्ति को उदासी, ऊर्जा की कमी और चिड़चिड़ापन महसूस होता है; इसके लक्षणों में ज्यादा सोना, और रोज़मर्रा की चीज़ों में रुचि कम होना शामिल है। इसका इलाज लाइट थेरेपी (प्रकाश चिकित्सा), थेरेपी (मनोचिकित्सा) और दवाओं से किया जा सकता है। 

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SAD के प्रमुख लक्षण

- दिनभर उदास महसूस करना, खासकर सर्दियों में।

- बहुत ज्यादा थकान महसूस होना।

- नींद ज्यादा आना (हाइपरसोम्निया) या सोने में परेशानी होना।

- सामाजिक गतिविधियों में रुचि कम होना और लोगों से दूर रहना।

- ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई आना। 

- निराशा या बेकार महसूस करना। 

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आत्महत्या के 90 प्रतिशत मामले ग्रामीण इलाकों में

बदायूं। आत्महत्या के 90 प्रतिशत मामले ग्रामीण इलाकों में सामने आते हैं। शहरी इलाकों में ऐसा कम ही देखने को मिलता है। इस बारे में क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट सर्वेश कुमारी का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा की कमी के कारण व्यक्ति के सोचने समझने की क्षमता भी सीमित हो जाती है। इस कारण वे बौद्धिक रूप से भी अपरिपक्व ही रहते हैं। इससे  वह और ज्यादा जल्दी अवसाद का शिकार होता है। 

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मन में हो अवसाद की भावना तो हेल्पलाइन नंबर पर करें कॉल

बदायूं। क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट ने बताया कि यदि किसी व्यक्ति में खुद में या किसी परिजन में अवसाद के लक्षण नजर आते है तो वह 14416 नंबर पर कॉल करके सहायता प्राप्त कर सकता है। यह टेलीमानस का हेल्पलाइन नंबर है, जिस पर मौजूद कॉलर समस्या बताने वाले की पूरी काउंसिलिंग करते हैं और समस्या का निदान करने की कोशिश करते हैं।








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