जब तक दो लोगों की जान नहीं गई, सब चलता रहा, आखिर किसकी शह पर होते रहे ये अवैध कब्जे ?
हत्यारोपित का तहेरा भाई भी एक नेता का खास, लोग दबी जुबान कर रहे चर्चा, वायरल तस्वीरें भी कुछ कह रहीं
सबकी बात न्यूज
बदायूं। एचपीसीएल में हुई घटना सिर्फ एक डबल मर्डर नहीं, बल्कि सिस्टम के मुंह पर तमाचा है। जब तक दो जिंदगियां नहीं चली गईं, तब तक सब ‘नॉर्मल’ था। अवैध कब्जे भी, बिजली चोरी भी, हाट से वसूली, सब ऐसे चल रहा था, मानो कोई देखने वाला ही न हो। जैसे ही खून बहा, अचानक पूरा तंत्र एक्टिव हो गया, बुल्डोजर गरजने लगे, फाइलें दौड़ने लगीं, और सालों से सोई आंखें खुल गईं।
एचपीसीएल के सीबीजी प्लांट के उप महाप्रबंधक सुधीर गुप्ता और सहायक प्रबंधक हर्षित मिश्रा की हत्या के बाद जिस प्रकार से हत्यारोपित अजय प्रताप सिंह को पकड़ा गया, उससे पुलिस और प्रशासन पर उंगलियां उठना लाजिमी है। जिस प्रशासन पर उस चिठ्ठी का असर तक नहीं हुआ, जिसमें दोनों लोगों ने अपनी हत्या का अंदेशा कुछ महीने पहले ही जता दिया था, हत्या के बाद वही प्रशासन और पुलिस महकमा कुंभकर्णी नींद से जाग गया। कार्रवाई करते हुए आरोपित अजय प्रताप की छह दुकानों पर बुल्डोजर चलवा दिया गया। अब सवाल ये नहीं है कि क्या कार्रवाई हुई, बल्कि सवाल ये है ये पहले क्यों नहीं हुई।
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सालों से चल रहा था ‘अवैध साम्राज्य’
बदायूं। सैजनी चौराहे पर खड़ी दुकानें कोई रातों-रात नहीं बनी थीं। 40 से ज्यादा दुकानों का जाल, हाट से रोजाना वसूली, बिजली चोरी, सब कुछ खुलेआम। तो क्या ये मान लिया जाए कि सिस्टम अंधा था या फिर जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा था? अब चर्चाएं तेज हैं। हत्यारोपित का तहेरा भाई अभय प्रताप, ब्लॉक प्रमुख अतेंद्र विक्रम सिंह का ‘खास' पहचान वाला बताया जा रहा है। वायरल तस्वीरें भी इशारा कर रही हैं कि रसूख और रिश्तों की छाया में ये सब फलता-फूलता रहा। हालांकि तस्वीरों से यह पुष्टि नहीं होती कि हत्यारोपित अजय प्रताप समेत अभय प्रताप, राकेश सिंह आदि को उनका संरक्षण था, लेकिन यह माना जा रहा है कि सत्ता की छाया इंसान का दुस्साहस जरूर बढ़ा देती है। अगर ये सच है, तो सवाल और गंभीर हो जाता है। क्या कानून भी पहचान देखकर काम करता है? खून के बाद ही क्यों दिखता है ‘अवैध’? (आप भी देखिये तस्वीरें) -


हत्या के बाद कब्जे दिखने लगे, अतिक्रमण नजर आने लगा, बिजली चोरी पकड़ में आ गई तो क्या सिस्टम को जागने के लिए हर बार खून चाहिए? असली सवाल ये हैं, जिनसे सिस्टम नहीं भाग सकता। ये भी सवाल हैं कि जब शिकायतें हुईं, तब कार्रवाई क्यों नहीं हुई ? सालों से अवैध कब्जे किसके संरक्षण में चलते रहे? क्या अब स्थानीय प्रशासन और पुलिस की जिम्मेदारी तय होगी या फिर ये मामला भी कुछ दिनों बाद ठंडा पड़ जाएगा?
निष्कर्ष सीधा है कि ये सिर्फ अपराध नहीं, ये प्रशासनिक विफलता और संरक्षण की कहानी है। अगर समय रहते कार्रवाई होती, तो शायद दो जिंदगियां बच सकती थीं। अब बुल्डोजर चलाकर सिस्टम अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। क्योंकि असली मलबा सिर्फ दुकानों का नहीं, किसी के भरोसे का भी गिरा है।
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अब तक ये हुई कार्रवाई
बदायूं। प्रशासन ने सैजनी चौराहे पर स्थित अजय प्रताप की छह दुकानों पर बुल्डोजर चलवा दिया। इसके साथ ही उसके राकेश प्रताप सिंह की पांच दुकानों को भी ध्वस्त कर दिया गया। चौराहे के ही दूसरी ओर एक पंचायत घर को भी तोड़ दिया गया। प्रशासन के अनुसार, यह दुकानें सरकारी जगहों पर कब्जा करके बनाई गई थीं। पंचायत घर भी सरकारी जमीन पर बना था, जिस पर अजय के परिवार वालों ने कब्जा कर रखा था। इसके अलावा ग्राम समाज की तालाब की करीब 40 बीघा जमीन पर भी प्रशासन ने यह कहकर फसलों को नष्ट करा दिया कि यह भी सरकारी जमीन पर कब्जा था।
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तहेरे भाई पर भी कई मुकदमे दर्ज
बदायूं। हत्यारोपित अजय प्रताप सिंह के तेहेरे भाई अभय प्रताप पर भी कई मुकदमे दर्ज हैं। पीएसी बटालियन के निर्माण भवन में तैनात सुरक्षा गार्ड समेत कई लोगों को धमकाने के मामले में पिछले साल उस पर एफआईआर दर्ज हुई थी। बताते हैं कि अभय को गांव में भी प्रधान जी कहकर बुलाया जाता है।
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