लोगों का सवाल- क्या इस बार भी बाहर का होगा प्रत्याशी या स्थानीय को मिलेगी वरीयता
बोले लोग- हर बार बाहर से लाकर प्रत्याशी थोप रही भाजपा, स्थाीय मिले तो सपा को मिले टक्कर
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बदायूं। सहसवान में भाजपा को विधानसभा का चुनाव पार्टी के कायकर्ता नहीं बल्कि प्रत्याशी का 'स्टाफ' लड़ाता है। यह हम नहीं बल्कि वहां के लोग कह रहे हैं। हर बार भाजपा यहां बाहर के प्रत्याशी को टिकट देकर चुनाव लड़ने भेज देती है और यही कारण है कि यहां सपा प्रत्याशी को टक्कर देना भाजपा के बस की बात नहीं लगती। लोगों का कहना है कि पार्टी को एक बार स्थानीय प्रत्याशी को भी वरीयता देनी चाहिए ताकि कार्यकर्ता भी मन से चुनाव लड़ा सके।
सहसवान से भाजपा के इतिहास की बात करें तो स्थापना के बाद भाजपा ने 1980 में चंद्रमोहन लाल को अपना प्रत्याशी बनाया था लेकिन वह तीसरे स्थान पर रहे थे। 1989 में बलवीर सिंह भाजपा से चुनाव लड़े लेकिन कई निर्दलीय भी उनसे जयादा वोट पाने में कामयाब रहे। बलवीर सिंह को केवल 559 वोट ही मिल पाए थे। 1991 में ब्रजपाल सिंह ने चुनाव लड़ा और तीसरे स्थान पर रहे। 1993 में लड़े भानुप्रताप सिंह भी तीसरे स्थान पर रहे। 1996 के चुनाव में मुलायम सिंह यादव जब यहां से चुनाव लड़े तो भाजपा ने महेश चंद्र गुप्ता को यहां से उतारा और पार्टी चुनाव हार गई। 2002 और 2007 में यहां जद-यू प्रत्याशी ने चुनाव लड़ा। 2012 में भाजपा ने मुस्लिम कार्ड खेलते हुए शकील खान को टिकट दिया लेकिन वो अपनी जमानत भी नहीं बचा सके और छठे नंबर पर खिसक गए। इसके बाद 2017 से भाजपा ने यहां बाहर के प्रत्याशी लाने शुरू कर दिए। 2017 में पार्टी ने चंदौसी निवासी आशुतोष वार्ष्णेय उर्फ भोला को टिकट दिया लेकिन वह चौथे स्थान पर खिसक गए। 2022 में भाजपा ने फिर वही गलती दोहराई और डीके भारद्वाज को प्रत्याशी बना दिया। हालांकि डीके भारद्वाज बदायूं के निवासी हैं लेकिन बतौर कर्मस्थली यहां से उनका कोई खास वास्ता नहीं रहा। नतीजतन भाजपा को एक बार फिर हार का सामना करना पड़ा।
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इस बार भी तमाम बाहर वाले टिकट की दौड़ में
बदायूं। इस बार भी भाजपा से बाहर वाले यहां से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। हाल ही में प्रदेश उपाध्यक्ष बनाए गए राजेश यादव भी यहां से टिकट मांग रहे हैं तो जिला पंचायत अध्यक्ष वर्षा यादव के पति जितेंद्र यादव का नाम भी सामने आ रहा है। हालांकि जितेंद्र यादव का जुड़ाव बदायूं से लगातार रहा है लेकिन जनता की नजर में वह भी बाहरी हैं। लोगों का कहना है कि बाहर के लोगों को सहसवान का स्थानीय भाजपा कार्यकर्ता मन से चुनाव नहीं लड़ाता क्योंकि बाहर के लोग अपना स्टाफ लेकर आते हैं। यही वजह रही कि सहसवान से बाहरी प्रत्याशी जनता को रास नहीं आए।
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सपा का रहा है दबदबा
बदायूं। इस सीट पर सपा का दबदबा रहा है। पिछले 2022 के चुनाव में तो सपा जीत की हैट्रिक लगा चुकी है। ऐसे में सपा को टक्कर देने के लिए लोगों की मांग है कि स्थानीय प्रत्याशी को तरजीह दी जाए। जातिगत समीकरण की बात करें तो यहां सबसे बड़ी हिस्सेदारी मुस्लिम मतदाताओं की है। इसके बाद यादव मतदाताओं की एक बड़ी संख्या है। क्षेत्र में मुस्लिम और यादव समुदाय का मजबूत वर्चस्व होने के कारण चुनाव में उनकी भूमिका सबसे प्रभावशाली मानी जाती है।
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