करोड़ों के घोटाले पर पर्दा और मलाई चाटता सिस्टम...इस बाबू की करतूतों पर खामोश क्यों हैं जिम्मेदार?
भ्रष्ट बाबुओं के आगे पंगु बना प्रशासन, करोड़ों के वारे-न्यारे करने वाले आज भी सीना तानकर घूम रहे खुलेआम
जांच के नाम पर सिर्फ लीपापोती, सहसवान में करोड़ों की संपत्ति खुर्द-बुर्द करने वालों को कौन दे रहा है संरक्षण?
सबकी बात न्यूज
बदायूं। रामलीला की अनुमति के लिए 50 हजार रुपये मांगने वाले बाबू आशीष सक्सेना पर करोड़ों की जमीनों को खुर्द-बुर्द करने के मामले में आज तक कोई कार्रवाई नहीं हो सकी तो इस बार क्या होगी। लोगों का कहना है कि अधिकारी भी माल काटने में लगे हैं तो बाबू के भ्रष्टाचार पर लगाम कैसे लगेगी। सहसवान की शत्रु संपत्ति से सटी जमीन को बेचकर करोडों के वारे-न्यारे करने वाले आज भी समाज में सिर ऊंचा करके घूम रहे हैं तो इस मामले में भी लीपापोती कर दी जाए तो कोई बड़ी बात नहीं। खास बात ये भी है कि जिन सिटी मजिस्ट्रेट के कार्यालय से आशीष सक्सेना संबद्ध है, उन्हीं को जांच टीम में शमिल कर लिया गया है।
इस चर्चित बाबू का पुराना मामला सहसवान के शहवाजपुर का है, जहां कुछ साल पहले लाखों में जमीन खरीदकर करोड़ों में बेच दिया गया था। फर्जी कागजों के आधार पर खुर्दबुर्द की गई जमीन के मामले में लाखों की टैक्स चोरी भी की गई। मामले की शिकायत हुई तो जांच बैठा दी गई। इस मामले में सहसवान में उन दिनों तैनात रहे कई कर्मचारियों की संलिप्तता भी सामने आई।
इसके अलावा सहसवान निवासी जमशेद की एक शिकायत पर सहसवान के तत्कालीन तहसीलदार धीरज कुमार, एसडीएम के तत्कालीन स्टेनो आशीष सक्सेना समेत कई कर्मचारियों के नाम भी सामने आए। तत्कालीन एडीएम रामनिवास शर्मा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय कमेटी ने इस मामले की जांच की तो उसमें इनको दोषी पाया गया, लेकिन अधिकारियों के स्थानांतरण होने के साथ मामला दब गया।
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ये था मामला
बदायूं। सहसवान के शहवाजपुर स्थित गाटा संख्या 118, 119, 120, 143, 145 आदि को लाखों में खरीदकर प्लाटिंग करके करोड़ों में बेच दिया गया था। कर्मचारियों ने पाकिस्तान जाने वाले लोगों के फर्जी वारिस पैदा कर दिए थे। विरासत में नवेद के पिता की जगह उसके नाना यानी हबीब बानों के पति खालिद उमर खान का नाम चढ़ा दिया गया था। इसके बाद नवेद की बहन इरम के नाम पर जो पॉवर ऑफ अटॉर्नी की गई उसमें कोई तारीख नहीं थी। इसके अलावा आर-6 के पृष्ठ संख्या 428 तथा 435 पर एक ही वाद संख्या 889 से नाम चढ़ाया गया था। जब यह गोलमाल उजागर हुआ तो तत्कालीन डीएम मनोज कुमार ने पुरानी फाइलें निकलवा लीं। बताया जाता है कि इसमें एक फाइल शत्रु संपत्ति से सटी जमीन को बेचने की जांच की तथा दूसरी दोषी पाए गए तहसीलदार समेत अन्य कर्मचारियों के संबंध में थी। निकाय चुनाव से पहले डीएम ने खुद जांच के आदेश करते हुए कहा था कि पूर्व में हुई जांच से वह संतुष्ट नहीं हैं इसलिए दोबारा जांच के आदेश दिए गए हैं लेकिन उनके स्थानांतरण के बाद मामले की फाइल फिर दबा दी गई।
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पहले भी जाते थे रुपये, अब ज्यादा मांगे
बदायूं। रामलीला की अनुमति के लिए पहले भी रुपये जाते रहे हैं, इसका खुलासा रामलीला कमेटीे के अरविंद कांत ने दबी जुबान किया है। उनके अनुसार इस बार बाबू आशीष सक्सेना ने ज्यादा रकम मांगी थी जो भाजपा जिलाध्यक्ष राजीव गुप्ता के संज्ञान में आ गई। इधर भाजपा जिलाध्यक्ष ने इसे नैतिक पतन बताते हुए कहा कि बाबू आशीष सक्सेना ने रकम मांगी थी लेकिन जिलाध्यक्ष ने यह भी इशारा किया कि इतनी हिम्मत बाबू किसी के इशारे पर ही कर सकता है। अब उनका इशारा किधर है, पब्लिक सब जानती है बाबू....।
फोटो सौजन्य-एआई
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