टिकटों की ब्लैक शुरू, बोली लगा रहे खरीदार... राजनीति की फ्लाॅप फिल्म फिर पांच साल चलने को तैयार

टिकटों की ब्लैक शुरू, बोली लगा रहे खरीदार... राजनीति की फ्लाॅप फिल्म फिर पांच साल चलने को तैयार


सबकी बात न्यूज। चालीस पार कर चुके लोगों को करीब तीन दशक पहले का सिनेमा का वो दौर तो याद ही होगा जब कोई जोरदार फिल्म किसी टाकीज में लगती थी तो टिकट ब्लैक में बिकती थी। सिनेमाघरों के बाहर ब्लैकिये टिकट को दोगुने और तीन गुने दामों पर बेचते थे। इन्हें खरीदकर फिल्मों के शौकीन तीन घंटे की पिक्चर का मजा लेते थे। फिल्म अच्छी हो तो बाहर आकर किस्से सुनाते थे, नहीं तो बेबकूफ बनकर हीरो से लेकर डायरेक्टर को कोसते हुए घर चले जाते थे। 

आज के दौर में सिनेमाघर तो खत्म हो चुके हैं लेकिन कहानी वही है। टिकट आज भी ब्लैक में बिक रहे हैं, पर ये राजनीतिक दलों के हैं। पहले फिल्म फ्लाॅप हो जाती थी तो दर्शक ये सोचकर चुप रह जाते थे कि चलो कुछ रुपये और तीन घंटे ही बर्बाद हुए पर आज उसका वोट और पांच साल बर्बाद होते हैं। पांच साल के लिए चुना गया जनप्रतिनिधि चार साल के लिए लापता हो जाता है और फिर अगले पांच सालों के लिए दोबारा कुर्सी पर काबिज होने की इच्छा लिए उन सड़कों के शिलान्यास में व्यस्त हो जाता है जो न तो उसके कार्यकाल के पिछले साढ़े चार सालों में बन पाई और न ही कभी आगे उनके बनने की उम्मीद होती है। इन नेताओं के चम्मच टाइप छुटभैये लोगों के जन्मदिनों की लिस्ट पहले ही तैयार करके रखते हैं, जिनमें बधाई देकर पूरा-पूरा दिन निकल जाता है। चूंकि मरने की लिस्ट पहले तैयार नहीं हो सकती तो उसे ‘आकस्मिक कार्यक्रम‘ में शामिल कर लिया जाता है। 

अब एक बार फिर लोकसभा चुनाव नजदीक हैं तो ब्लैक में टिकट बेचने को पार्टियां तैयार हैं। खरीदारों की भी लाइन लगी है। एक पार्टी की इस समय बल्ले बल्ले है तो उसके टिकट खरीदने वाले ज्यादा हैं जबकि एक में खरीदार ढूंढे जाने की कोशिश जारी है। एक धर्म विशेष को अपना वोट बैंक मानने वाली पार्टी में अंदरूनी हंगामा मचा है। इसके टिकट के कुछ खरीदार बागी हो चुके हैं तो एक पार्टी अपना मुंह केवल इसलिए बंद रखे है कि कोई न कोई बागी उसकी झोली में आकर गिरेगा और उसे टिकट की सही कीमत मिल जाएगी।

खैर...राजनीति की इस फिल्म में बेचने वाला भी लाभ में है और खरीदने वाला भी लेकिन दर्शक यानी जनता हर बार बेवकूफ ही बनती है। सिनेमाघर की फ्लाॅप फिल्म तीन घंटे को झेलनी पड़ती है तो यह फिल्म पांच साल के लिए छाती पर दोमुंहे सांप की तरह रेंगती रहती है। अब जनता उसे झटक भी नहीं सकती, न ही जोर से बोल सकती है। जनता डरती है कि जोर से आवाज निकली तो सांप उसे डंस लेगा। ऐसे में उसे तो बस चुपचाप मृतप्राय उस सांप को देखते ही रहना है। तो जनता जनार्दन........एक बार फिर तैयार हो जाइये, पांच साल के लिए एक और फ्लाॅप फिल्म देखने को। टिकट बिकने लगे हैं, खरीदार बोली लगाने लगे हैं। जाइये फिल्म देखिये और कोसने को तैयार रहिए, क्योंकि पिछले पांच सालों में भी कुछ नहीं मिला और आगे भी कुछ नहीं मिलने वाला......हम भी आपको राजनीति के किस्से बताते रहेंगे। बने रहिये हमारी वेबसाइट https://sabkibaat.in/ पर। 

सबकी बात-





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