जागने लगा नेताओं का 'स्वाभिमान'...दूसरी पार्टी में 'मलाई' देखकर याद आने लगा सम्मान और अपमान
पूर्व विधायक कुशाग्र सागर का इस्तीफा चर्चा में, इससे पहले पूर्व सांसद भी कर चुके टाटा, बाय-बाय
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बदायूं। कुर्सी की मलाई जब तक मीठी लगती है, तब तक पार्टी के सारे अवगुण अमृत बन जाते हैं, लेकिन जैसे ही टिकट कटने या डूबती नाव का अहसास होता है, नेताओं के सीने में 'स्वाभिमान का ज्वालामुखी' अचानक फूट पड़ता है। बिसौली के पूर्व विधायक कुशाग्र सागर का इस्तीफा इसका ताज़ा नमूना है। 11 साल तक जिस पार्टी का झंडा उठाया, वह चुनाव पास आते ही कसैली लगने लगी और कई पन्नों के त्यागपत्र में सीधा अपमान का जिन्न बाहर आ गया।
यही हाल आंवला के पूर्व सांसद धर्मेंद्र कश्यप का भी रहा, जिनका राजनीतिक सफर किसी 'आयाराम-गयाराम' की स्क्रिप्ट से कम नहीं है। बसपा से शुरू हुआ सफर सपा, फिर भाजपा और अब जरूरत के हिसाब से फिर पाला बदलने की फेहरिस्त यह साबित करती है कि इन नेताओं के लिए विचारधारा सिर्फ एक रैनबसेरा है। राज्यसभा की उम्मीद टूटी या बेटी के लिए ज़मीन तैयार करनी पड़ी, तो फेसबुक पर टाटा-बाय-बाय लिखकर तुरंत नया ठिकाना तलाश लिया गया।
इससे पहले भाजपा के दातांगज विधायक राजीव कुमार सिंह के खासमखास माने जाने वाले केसी शाक्य ने भी यही सम्मान और अपमान का 'इंजेक्शन' देकर भाजपा से किनारा कर लिया था। साफ है कि चुनाव सिर पर हैं, पुरानी नाव अब पार उतरती दिख नहीं रही। ऐसे में अभी इंतजार करिए, नई नाव पर मलाईदार सफर जारी रखने के लिए यह अपमान-अपमान का खेल अभी कुछ दिन और बदायूं के गलियारों में गूंजता रहेगा।
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टिकट के लिए प्रयासरत हैं और भी दलबदलू
बदायूं। बदायूं विधानसभा से साल 2002 के चुनाव में बसपा के टिकट पर लड़े विमल कृष्ण अग्रवाल विधायक चुने गए थे लेकिन बदायूं से 2007 और बिल्सी से 2012 का चुनाव उन्होंने सपा के झंडे के नीचे लड़ा। दोनों ही बार उन्हें हार का सामना करना पड़ा। भाजपा की लहर चलती देख विमल कृष्ण ने 2022 में कमल का फूल थाम लिया। अब एक बार फिर उनके होर्डिंग्स बदायूं विधानसभा में दिखाई दे रहे हैं। बदायूं विधानसभा क्षेत्र से ही पुराने कांग्रेसी रहे फखरे अहमद शोबी ने 2002, 2007 और फिर 2012 का चुनाव कांग्रेस के टिकट से लड़ा। हर बार वह चौथे स्थान पर ही रहे। कांग्रेस में रहकर विधायकी का सपना पूरा न होते देख उन्होंने समाजवादी पार्टी का दामन पकड़ लिया, हालांकि तमाम कोशिशों के बाद भी उन्हें सपा ने अब तक टिकट नहीं दिया है।
दातागंज विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस से कई बार विधायक रहीं संतोष कुमारी पाठक का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। संतोष कुमारी के बेटे शैलेश पाठक की भी राजनीतिक विचारधारा शुरुआत से कांग्रेसी रही। साल 2002, 2007 और 2012 का चुनाव उन्होंने कांग्रेस के टिकट पर लड़ा, लेकिन बदकिस्मती से हर बार उन्हें हार का ही सामना करना पड़ा। वह कभी दूसरे, कभी तीसरे तो कभी चौथे स्थान तक पर सिमटकर रह गए। कांग्रेस से विधायक न बन पाने और पार्टी का ग्राफ लगातार गिरता रहने के कारण उन्होंने 2022 में भाजपा का चोला ओढ़ लिया। अब वह भी दातागंज से भाजपा का टिकट पाने का प्रयास कर रहे हैं। कुछ ऐसा ही रहा सिनोद कुमार शाक्य के साथ, जो बसपा के टिकट पर 2007 और फिर 2012 में दो बार विधायक चुने गए। 2002 और 2017 का चुनाव भी वह बसपा के टिकट पर लड़े थे लेकिन जीत नहीं पाए। 2022 में उन्होंने भी लहर चलती देख भाजपा का साथ पकड़ लिया। साल 2002 में बसपा के टिकट से विनावर विधानसभा से चुनाव जीतकर विधायक और मंत्री बनने वाले भूपेंद्र सिंह दद्दा ने 2007 का चुनाव भी विनावर से सपा के टिकट पर लड़ा लेकिन जीत नहीं पाए। 2012 में जब सपा से टिकट नहीं मिला तो वह महान दल में शामिल हो गए और बदायूं से चुनाव लड़ा। 2017 में टिकट पाने के लिए वह फिर से बसपा में शामिल हो गए और चुनाव में ताल ठोंकी, लेकिन फिर भी विधायक बनने का सपना पूरा नहीं हो पाया। अब वे भी खुद को सपा का बदायूं विधानसभा क्षेत्र से दावेदार के रूप में सामने ला रहे हैं। वर्तमान सपा नेता काजी मो. रिजवान ने 2012 और 2017 का चुनाव शेखूपुर विधानसभा क्षेत्र से बसपा के टिकट पर लड़ा, लेकिन वहां से जीत न मिलती देख सपाई चोला ओढ़कर उन्होंने कई टिकट पाने का प्रयास किया, लेकिन टिकट पाने में ही सफल नहीं हो सके। एक बार फिर वह लाइन में हैं।
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अभी तो और होगी भागमभाग
बदायूं। अभी चुनाव में वक्त है लेकिन एक पार्टी से दूसरी पार्टी में भागमभाग और होनी हैं। कुछ पूर्व विधायक और मंत्री भी इस लिस्ट में शामिल हैं जो ऐन मौके पर टिकट के लिए पाला बदल सकते हैं।
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